500+ Best Mirza Ghalib Shayari in Hindi And Urdu With Images


ग़ालिब की शायरी - Read Best Mirza Ghalib Shero Shayari in Hindi/Urdu. Find Great Collection Of Mirza Ghalib Shayari On Life, Love, Taj Mahal, Sharab, Beauty, Dealth, Dosti, Khuda ( God ), Bewafai, Dard, Pyar, Mohabbat And Ishq.

mirza ghalib shayari
Mirza Ghalib Shayari

मिर्ज़ा गालिब के प्रसिद्ध शेर और शायरी हिन्दी और उर्दू मे



हाथों की लकीरो पे मत जा ग़ालिब
नसीब उनके भी होते है जिनके हाथ नहीं होते




उनके देखने से जो आ जाती है चेहरे पे रौनक
वो समझते है के बीमार का हाल अच्छा है

mirza ghalib shayari on life
Mirza Ghalib Shayari On Life


उम्र भर हम भी गलती करते रहे ग़ालिब
धुल चेहरे पे थी और हम आईना साफ़ करते रहे




इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

mirza ghalib shayari on taj mahal
Mirza Ghalib Shayari On Taj Mahal


आशिक़ी सब्र -तलब और तमना बेताब
दिल का क्या रंग करू, खून-ऐ-जिगर होने तक

Mirza Ghalib Shayari in Hindi


हमने माना की तग़ाफ़ुल न करेंगे लेकिन
खाक हो जायगे हम तुम्हे खबर होने तक




आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुलफ के सर होने तक

mirza ghalib shayari on sharab
Mirza Ghalib Shayari On Sharab


इश्क़ पर जोर नहीं , यह तो वो आतिश है, ग़ालिब
के लगाये न लगे और बुझाए न बुझे




हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया, पर याद आती है
जो हर एक बात पे कहना की यूं होता तो क्या होता

mirza ghalib shayari on beauty
Mirza Ghalib Shayari On Beauty


पीने दे शराब मस्जिद में बैठ के , ग़ालिब
या वो जगह बता जहाँ खुदा नहीं है

Mirza Ghalib Shayari in Urdu


वो आये घर में हमारे , खुदा की कुदरत है
कभी हम उन्हें कभी अपने घर को देखते है




हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान , लेकिन फिर भी कम निकले

mirza ghalib shayari on death
Mirza Ghalib Shayari On Death


तू तो वो जालिम है जो दिल में रह कर भी मेरा न बन सका , ग़ालिब
और दिल वो काफिर, जो मुझ में रह कर भी तेरा हो गया




अब किस किस की मिसाल दू में तुम को
हर सितम बे-मिसाल करते हो

mirza ghalib shayari on dosti
Mirza Ghalib Shayari On Dosti


मारना चाहे तो मर नहीं सकते
तुम भी जिन मुहाल करते हो

Mirza Ghalib Shayari On Life


शहर-ऐ-दिल में उदासियाँ कैसी
यह भी मुझसे सवाल करते हो




देख कर पूछ लिया हाल मेरा
चलो कुछ तो ख्याल करते हो

Mirza Ghalib Shayari On Love


दुःख दे कर सवाल करते हो
तुम भी ग़ालिब कमल करते हो




आज फिर इस दिल में बेक़रारी है
सीना रोए ज़ख्म-ऐ-कारी है
फिर हुए नहीं गवाह-ऐ-इश्क़ तलब
अश्क़-बारी का हुक्म ज़ारी है
बे-खुदा , बे-सबब नहीं , ग़ालिब
कुछ तो है जिससे पर्दादारी है

mirza ghalib shayari on khuda
Mirza Ghalib Shayari On Khuda


यूं तो हम हिज़र में भी दीवार -ओ -दर को देखते हैं
कभी सबा को कभी नामाबर को देखते हैं
वो आये घर में हमारे खुदा की कुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

Mirza Ghalib Shayari On Taj Mahal


दर्द हो दिल में तो दबा कीजिये
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजिये




उग रहा है दर-ओ -दीवार पे सब्ज़ा “ग़ालिब “
हम बयाबान में हैं और घर में बहार आई है ..

mirza ghalib shayari on bewafai
Mirza Ghalib Shayari On Bewafai


निकलना खुद से आदम का सुनते आये हैं लकिन
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले

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तुम उसकी राह न देखो वो ग़ैर था साक़ी
भुला दो उसको वो ग़ैरों का हो चूका होगा !

-

वो मेरा प्यार , तलब और मेरा चैन -ओ -क़रार
जफ़ा की हद में ज़माने का हो चूका होगा ,

Mirza Ghalib Shayari On Sharab


मेरी आवाज़ को जो साज़ कहा करता था
मेरी आहोँ को याद कर के सो चूका होगा ,

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जो मेरे साथ मोहब्बत में हद -ऐ -जूनून तक था
वो खुद को वक़्त के पानी से धो चूका होगा ,

-

वफ़ा के ज़िक्र में ग़ालिब मुझे गुमाँ हुआ
वो दर्द इश्क़ वफाओं को खो चूका होगा ,

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इश्क़ पर ज़ोर नहीं , है ये वो आतिश ग़ालिब
के लगाये न लगे , और बुझाए न बने

-

मौत की रह न देखूं ? के बिन आये न रहे
तुम को चाहूँ ? के न आओ , तो बुलाये न बने

Mirza Ghalib Shayari On Beauty


कह सकेगा कौन , ये जलवा गारी किस की है
पर्दा छोड़ा है वो उस ने के उठाये न बने

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इस नज़ाकत का बुरा हो , वो भले हैं , तो किया
हाथ आएं , तो उन्हें हाथ लगाये न बने

-

ग़ैर फिरता है लिए यूँ तेरे खत को कह अगर
कोई पूछे के ये क्या है , तो छुपाये न बने

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खेल समझा है , कहीं छोड़ न दे , भूल न जाये
काश ! यूँ भी हो के बिन मेरे सताए न बने

-

खेल समझा है , कहीं छोड़ न दे , भूल न जाये
काश ! यूँ भी हो के बिन मेरे सताए न बने

Mirza Ghalib Shayari On Death


मैं बुलाता तो हूँ उस को , मगर ऐ जज़्बा -ऐ -दिल
उस पे बन जाये कुछ ऐसी , के बिन आये न बने

-

नुक्ता चीन है , गम -ऐ -दिल उस को सुनाये न बने
क्या बने बात , जहाँ बात बनाये न बने

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तेरे हुस्न को परदे की ज़रुरत नहीं है ग़ालिब
कौन होश में रहता है तुझे देखने के बाद

-

रात है ,सनाटा है , वहां कोई न होगा, ग़ालिब
चलो उन के दरो -ओ -दीवार चूम के आते हैं

-

बहुत सही गम -ऐ -गति शराब कम क्या है
गुलाम -ऐ-साक़ी -ऐ -कौसर हूँ मुझको गम क्या है
तुम्हारी तर्ज़ -ओ -रवीश जानते हैं हम क्या है
रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है
सुख में खमा -ऐ -ग़ालिब की आतशफशनि
यकीन है हमको भी लेकिन अब उस में दम क्या है

Mirza Ghalib Shayari On Dosti


रही न ताक़त -ऐ -गुफ्तार और अगर हो भी ,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है ..

-

“ग़ालिब” छूटी शराब पर अब भी कभी कभी ,
पीता हूँ रोज़ -ऐ -अबरो शब -ऐ -महताब में

-

करने गए थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिला
बस एक ही निगाह की बस ख़ाक हो गए

-

पूछते हैं वो की ‘ग़ालिब ‘ कौन है ?
कोई बतलाओ की हम बतलायें क्या

-

हो चुकी ‘ग़ालिब’, बलायें सब  तमाम ,
एक मरगे -नागहानी और है .

Mirza Ghalib Shayari On Maa


दे के खत , मुहँ देखता है नामाबर ,
कुछ तो पैगामे जुबानी और है .

-

बारहन उनकी देखी हैं रंजिशें ,
पर कुछ अबके सिरगिरांनी और है .

-

आतशे – दोज़ख में , यह गर्मी कहाँ ,
सोज़े -गुम्हा -ऐ -निहनी और है .

-

कोई , दिन , गैर  ज़िंदगानी और है
अपने जी में  हमने ठानी और है .

-

ख्वाहिशों का काफिला भी अजीब ही है ग़ालिब
अक्सर वहीँ से गुज़रता है जहाँ रास्ता नहीं होता

Mirza Ghalib Shayari On Khuda


ग़ालिब ‘ हमें न छेड़ की फिर जोश -ऐ -अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या -ऐ -तूफ़ान किये हुए

-

गम -ऐ -हस्ती का असद किस से हो जूझ मर्ज इलाज
शमा हर रंग मैं जलती है सहर होने तक ..

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आया है मुझे बेकशी इश्क़ पे रोना ग़ालिब
किस का घर जलाएगा सैलाब भला मेरे बाद

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हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की किस्मत ग़ालिब
जिस की किस्मत में हो आशिक़ का गरेबां होना

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नादान हो जो कहते हो क्यों जीते हैं “ग़ालिब “
किस्मत मैं है मरने की तमन्ना कोई दिन और

Mirza Ghalib Shayari On Bewafai


“ग़ालिब ” बुरा न मान जो वैज बुरा कहे
ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहे जिसे

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उल्फ़त पैदा हुई है , कहते हैं , हर दर्द की दवा
यूं हो हो तो चेहरा -ऐ -गम उल्फ़त ही क्यों न हो .

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हो लिए क्यों नामाबर के साथ -साथ
या रब ! अपने खत को हम पहुँचायें क्या

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लाग् हो तो उसको हम समझे लगाव
जब न हो कुछ भी , तो धोखा खायें क्या

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मारा ज़माने ने ‘ग़ालिब’ तुम को
वो वलवले कहाँ , वो जवानी किधर गई

Mirza Ghalib Shayari On Barish


दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई
दोनों को एक अदा में रजामंद कर गई

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इश्क़ मुझको नहीं वेहशत ही सही
मेरी वेहशत तेरी शोहरत ही सही
कटा कीजिए न तालुक हम से
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही

-

कितने शिरीन हैं तेरे लब के रक़ीब
गालियां खा के बेमज़ा न हुआ
कुछ तो पढ़िए की लोग कहते हैं
आज ‘ग़ालिब ‘ गजलसारा न हुआ

-

लाज़िम था के देखे मेरा रास्ता कोई दिन और
तनहा गए क्यों , अब रहो तनहा कोई दिन और

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इस नज़ाकत का बुरा हो , वो भले हैं तो क्या
हाथ आएँ तो उन्हें हाथ लगाए न बने
कह सके कौन के यह जलवागरी किस की है
पर्दा छोड़ा है वो उस ने के उठाये न बने

Ghalib Ki Love Shayari


दिल दिया जान के क्यों उसको वफादार , असद
ग़लती की के जो काफिर को मुस्लमान समझा

-

थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े ,
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ

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लफ़्ज़ों की तरतीब मुझे बांधनी नहीं आती “ग़ालिब”
हम तुम को याद करते हैं सीधी सी बात है

-

मोहब्बत मैं नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते है जिस काफिर पे दम निकले

-

तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा
नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख

Ghalib Ki Sad Shayari


खुदा के वास्ते पर्दा न रुख्सार से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो जहाँ भी वही काफिर सनम निकले

-

ज़रा कर जोर सीने पर की तीर -ऐ-पुरसितम् निकले जो
वो निकले तो दिल निकले , जो दिल निकले तो दम निकले

-

सबने पहना था बड़े शौक से कागज़ का लिबास
जिस कदर लोग थे बारिश में नहाने वाले
अदल के तुम न हमे आस दिलाओ
क़त्ल हो जाते हैं , ज़ंज़ीर हिलाने वाले

-

बाजीचा-ऐ-अतफाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

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फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है

Ghalib Ki Shayari Pyar Par


हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को “ग़ालिब” यह ख्याल अच्छा है

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क़ासिद के आते -आते खत एक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में

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बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है

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तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे

-

मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी

Ghalib Ki Shayari Urdu Me


मेह वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ऐ-ग़ैर में या रब
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहान अपना
मँज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते “ग़ालिब”
अर्श से इधर होता काश के माकन अपना

-

सादगी पर उस के मर जाने की  हसरत दिल में है
बस नहीं चलता की फिर खंजर काफ-ऐ-क़ातिल में है
देखना तक़रीर के लज़्ज़त की जो उसने कहा
मैंने यह जाना की गोया यह भी मेरे दिल में है

-

फिर तेरे कूचे को जाता है ख्याल
दिल -ऐ -ग़म गुस्ताख़ मगर याद आया
कोई वीरानी सी वीरानी है .
दश्त को देख के घर याद आया

-

मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें
चल निकलते जो में पिए होते
क़हर हो या भला हो , जो कुछ हो
काश के तुम मेरे लिए होते
मेरी किस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब कई दिए होते
आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब ’
कोई दिन और भी जिए होते

-

कहा है किस ने की “ग़ालिब ” बुरा नहीं लेकिन
सिवाय इसके की आशुफ़्तासार है क्या कहिये

Ghalib Ki Shayari Dard Par


तुम्हें नहीं है सर-ऐ-रिश्ता-ऐ-वफ़ा का ख्याल
हमारे हाथ में कुछ है , मगर है क्या कहिये

-

समझ के करते हैं बाजार में वो पुर्सिश -ऐ -हाल
की यह कहे की सर -ऐ -रहगुज़र है , क्या कहिये

-

ज़ाहे -करिश्मा के यूँ दे रखा है हमको फरेब
की बिन कहे ही उन्हें सब खबर है , क्या कहिये

-

यह ज़िद की आज न आये और आये बिन न रहे
काजा से शिकवा हमें किस क़दर है , क्या कहिये

-

दिया है दिल अगर उस को , बशर है क्या कहिये
हुआ रक़ीब तो वो , नामाबर है , क्या कहिये

Ghalib Short Ghazal in Hindi


चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ , चंद हसीनों के खतूत .
बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला

-

गैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तश्ना-ऐ-लब पैगाम के
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने “ग़ालिब” निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

-

हो चुकीं ‘ग़ालिब’ बलायें सब तमाम ,
एक मर्ग -ऐ -नागहानी और है .

-

देके खत मुँह देखता है नामाबर ,
कुछ तो पैगाम -ऐ -ज़बानी और है 

-

बारह देखीं हैं उन की रंजिशें ,
पर कुछ अब के सरगिरानी और है 

Ghalib Quotes in Hindi


आतिश -ऐ -दोज़ख में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ऐ -गम है निहानी और है

-

कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
अपने जी में हमने ठानी और है 

-

आए है बेकसीए इश्क़ पे रोना ग़ालिब
किसके घर जाएगा सेलाब-ए-बला मेरे बाद

-

कौन होता है हरीफ-ए-मये-मर्द अफ़गने-इश्क़
है मुकरर्र लब-ए-साक़ी से सला मेरे बाद
जब मैं नही रहा तो साक़ी ने लगातार आवा

-

शम्आ बुझती है तो उस में से धुआं उठता है
शोला-ए-इश्क़ सियह-पोश हुआ मेरे बाद

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